Saturday, January 29, 2011

बूँदें

बूँदें !!!
ये बूँदें !!
ये कैसी बूँदें!!
कुछ द्रश्य सी ,कुछ अद्रश्य सी...
कुछ नयनाभिराम...
कुछ नयन वेधती....
कभी नभ से...जीवन से..
कभी मन से...पीड़ा से...
कभी धरा पे ... कभी धरा से ....
कभी अचल पे... कभी अविरल बन ....
कभी चन्द्र मुखी सी ..चंचल चपल चतुर कामुक सी...
जो विश्वमित्र् का त़प बिसराए .....
कभी विश्वमित्र का क्रोध बन जाये ...
मैं असमंजस में ....
मैं आश्चर्य में ...
क्या समझूँ तुमको
क्या समझाऊं तुमको ...
तुम निराकार हो तुम निर्विकार हो...
कुछ कुछ वह प्रथम भी कुछ वैसा ही है...
सच कहो क्या तुम वही प्रथम हो...!!!!